मेरा गाँव प्रागपुर जालंधर छावनी से एक किलोमीटर की दुरी पर था और वहां से नंगलपुर गांव की दुरी आधा किलोमीटर थी …. मेरे गाँव औरनंगलपुर के बीच की इस दूरी के बारे में मशहूर था कि रास्ते में कम से कम तीन जगहों पर चुड़ैलो का बसेरा था…. अगर कोई रात के समय सफर करे तो पीछे से चुड़ैलें आवाजें देकर उसे बुलाती थी और जब कोई शख्स मुड़कर देख लेता था तो फिर उनके जादू से बच नहीं सकता था …..
अब पता नहीं वह मेरा वहम थाया हकीकत थी कि मेरा वास्ता दो-तीन बार रात को सफर के दौरान उन आवाजों से पड़ा मगर मैंने वालिदैन कि हिदायत के मुताबिक पीछे मुड़कर नहीं देखा ….. शायद यही वजह थी कि जिन्नों, भूतों और प्रेतों के मामले में मेरा खौफ किसी हद तक कम हो गया था ….
चुड़ैलो के बसेरों के अतिरिक्त भी मेरे गांव के पीछे की तरफ एक और जगह थी जो की प्रेतग्रस्त कहलाती थी ….वहां पर खेतों के बीच बेरी का एक पेड़ था जिसके पास ही हमगांव के लड़के कबड्डी- कबड्डी खेला करते थे …. लोगों को उस पेड़ से दूर रखने के लिए मिटटी की एक दिवार सी बना दी गई थी …. फिर भी हम बच्चों ने उसके एक कोने से दिवार को तोड़कर रास्ता बना लिया था ….
एक बार कबड्डी खेलने के दौरान मेरी नजर अचानक ही उस मिटटी में एक सुराख पर पड़ी जिसमे से की भिड़े (ततैया ) अंदर –बाहर आ और जा रही थी ….मैंने अपनी उस कम उम्र की कमअक्ली के वश में होकर एक ढेला उठाकर उस सुराख के उपर दे मारा …. ढेला लगने से चार –पांच भिड़े ‘मौका- ए- वारदात’ पर तुरंत ही अल्लाताला को प्यारी ही गई जबकि कुछेक ‘भाग्यशाली’ जख्मी भी हो गई थी …. उस शरारत को करने के बाद इस हैरतअंगेज मंजर को मैं बड़ी ही हैरानी और उत्सुकता से देख ही रहा था की मुझको ऐसा महसूस हुआ की जैसे किसी ने मेरे श्री मुख पर एक जोरदार चांटा (शरद पवार कि तरह ) रसीद कर दिया हो और मैं उसी जगह पर गिर कर बेहोश हो गया…..
वहां पर मौजूद सभी कबड्डी खेलने वाले लड़के मुझको बेहोश देख कर परेशान हो गए और तुरन्त ही उन्होंने मुझको उठा कर घर पर पहुंचा दिया …. वालिदा और दीदी मुझको बेहोश देख कर घबरा गई और रौना पीटना शुरू कर दिया…. जब उन्होंने मुझको लाने वाले लड़को से सारा माजरा सुना तो तुरंत गांव के एक ओझा को बुलवाया ….. उसके इलाज रूपी कोशिशों से काफी देर के बाद मुझको होश आया …..उसने मेरे घरवालो को बतलाया की वोह भिड़े दरअसल में जिन्नथे जोकि उस समय शादी के जलसे में भाग ले रहे थे …. इस बच्चे ने जो ढेला मारा था उससे लगने से एक ही खानदान का प्रमुख जिन्न + उसकी दो बेटियां और एक जवान बेटा मारे गए थे ….. उसकी बीवी इस हमले के दौरान जख्मी हो गई थी जबकि उसकी एक बेटी जोकि अंदर प्रवेश कर चुकी थी , वोहबच गई थी …. उसी ने इस बच्चे को मारने की कोशिश की थी लेकिन अच्छी किस्मत के बलबूते यह बच गया …..
उस ओझा ने लगातार सात दिन तक आकर के मेरा इलाज किया और फिर मेरे बाजू पर एक काला धागा इस चेतावनी के साथ बाँधदिया की यह टूटने न पाए …. इसी दौरान मुल्क का बंटवारा हो गया तो हम लोग पकिस्तान में सक्खर चले गए …. सक्खर में दो साल के बाद पांचवी कक्षा में दाखिले के बाद पढ़ाई से मन बेजार होने के कारण वालिद साहिब ने मुझको एक ओवरसियर के साथ हैल्पर लगा दिया था ….. एक दिन घर से निकलते समय दरवाजे में लगी हुई कील से बाजू जख्मी होने के साथ -२ वोह पवित्र धागा भी टूट गया …. मुझको इसका पता तब चला जब किसी ने आकर मेरे गाल पर एक जोरदार झन्नाटेदार थप्पड़ मारा और मेरा गला दबाया …. मैं चीख मारकर बेहोश हो गया ….. यह मेरी खुशकिस्मती थी कि हमारी मस्जिद के मौलवी साहिब नजदीक ही रहते थे …. लिहाजा , मेरे बेहोश होने के बाद मेरा जख्मी बाजू तथा “टूटा हुआ धागा” देखने के बाद मेरी दादी अम्मा अस्मा ने मौलवी साहिब को बुला भेजा …. मौलवी साहिब ने आकर एक तावीज पहनने के लिए दिया और ताकीद की कि “उसे हमेशा पहने रहना , वर्ना वह जिन्नी तुम्हे जिंदा नहीं छोड़ेगी….. इसके इलावा उन्होंने यह भी कहा कि मेरा इल्म सिर्फ इतना ही है ….. मैंने तुम्हे उससे महफूज कर दिया है …. मगर तुम किसी बड़े आमिल (तांत्रिक ) के पास जरूर चले जाना” ….
इस घटना के कुछ अरसे के बाद मैंने खराद का काम सीखना शुरू कर दिया था …. एक रोज मेरे वालिद को उनके ओवरसियर ने एक अंग्रेज साहिब की गाड़ी को ठीक करने के लिए उनके बंगले में भेजा, जोकि वहां से कुछ फासले पर कालोनी में बना हुआ था …. मेरे वालिद साहिब ने वहां जाते हुए कहा , बेटा, छुटटी करके वहीँ पर आ जाना ….. हम वहीं से इक्कट्ठे ही अपने घरको चलेंगे ….. मैं दोपहर के तीन बजे के करीब अपनी साइकल से वहां पर पहुँच गया ….. उस बंगले में अंग्रेज साहिब अपनी बीवी और बेटी के साथ रहते थे ….. जब मैं वहां पर पहुंचा तो वह लड़की वहां पर झूला झूल रही थी और मेरे वालिद साहिब गैराज में मोटर को ठीक कर रहे थे ….. मैं ख़ामोशी से वालिद साहिब के पास जाकर खड़ा हो गया …. जब उसलड़की ने मुझको वहां पर खड़े देखा तो इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और टूटी फूटी उर्दू में मेरा नाम पूछा ….. मैंने कहा , “मेरा नाम खालिदहै” …..
“मेरा नाम ऐनी है , तुम झूलाझूलेगा ?” वह बोली ….. मेरे सिर हिलाने पर वह झूले पर से उतर गई ….. फिर हम दोनों बारी–बारी से उस झूले पर झूलते रहे …. इसके बाद मेरी उस लड़की से अच्छी खासी दोस्ती हो गई ….. उसके बाद भी मैं अक्सर उसके पास खेलने के लिएजाने लगा …. लेकिन एक बात पर मैं बहुत हैरान होता था कि जब भी मैं उस बंगले पर ऐनी सेमिलने गया , वह मुझको हर बार बाहर ही खेलती मिली और मुझे उसके इलावा और कोई दूसरा नजरनहीं आया ……
एक दिन उससे झूला झूलते समयमैंने कहा , “आओ ऐनी मेरे साथबैठ कर झूला झूलों”…. वह फौरन ही राजी हो गई लेकिन जैसे ही उसने मेरे पास बैठनेकि कोशिश की एकदम चीख मारकर पीछे हट गई …. “क्या हुआ ?” मैंने पूछा …..
“लगता है किसी चीज ने काट लिया है” वह बोली …. मैंने उसके हाथों की तरफ देखा तो वहां पर कुछ भी नहीं था …..
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